Culture and Tradition of Uttarakhand in Hindi- देवभूमि उत्तराखंड अपनी संस्कृति, परंपरा, भाषा और खान-पान के लिए प्रसिद्ध है, जानें वहाँ की कुछ खास बातें

Culture and Tradition of Uttarakhand in Hindi- भारत के नवगठित राज्य, उत्तराखंड को प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। हिमालय की बर्फीली चोटियाँ, असंख्य झीलें, हरी-भरी हरियाली क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को निहारती है। उत्तराखंड के ग्लेशियर गंगा और यमुना जैसी नदियों का उदय स्थान है। राष्ट्रीय उद्यान और वन इस क्षेत्र में पनपे हैं। यह मंदिरों और तीर्थ स्थानों के लिए एक घर है। चार-धाम पवित्र हिंदू मंदिरों में से एक है। इस प्रकार धार्मिक रीति-रिवाज और वन्यजीव विरासत की समृद्धता उत्तराखंड की भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का सही प्रतिनिधित्व करते हैं। इस आर्टिकल में हम आपको देवभूमि उत्तराखंड के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं, इसलिये इस लेख को पूरा पढ़ें और आगे भी शेयर करें।

Culture and Tradition of Uttarakhand in Hindi

Culture and Tradition of Uttarakhand in Hindi

उत्तराखंड का इतिहास – History of Uttrakhand – Uttrakhand ka itihas

महाभारत का लेखन महर्षि व्यास ने इसी देवभूमि उत्तराखंड में किया था। उत्तराखंड की सांस्कृतिक और भौतिक विरासत को दो भागों, कुमाऊं और गढ़वाल में बांट सकते हैं। सभी कहानियों में इन दोनों का ज़िक्र ख़ूब मिलेगा। इस देवभूमि उत्तराखंड को हम तपोभूमि की संज्ञा भी देते हैं। उत्तराखंड के ऊपर पुरु वंश ने शासन प्रारंभ किया जिस पर आगे चलकर नंद, मौर्य, कुषाण ने शासन किया। गढ़वाल के पश्चिमी हिस्से में बनी भगवान बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था। आगे इस पर ब्रिटिशों ने भी राज किया। कुछ ऐसे ही ऐतिहासिक तथ्य उत्तराखंड की गलियों से गुज़रते हुए मिलते हैं जिसमें एक बड़ा नाम चिपको आन्दोलन का है जिसमें देश के बड़े पर्यावरणविदों और नेताओं ने भी साथ दिया और इसने देश के सबसे बड़े अहिंसक आन्दोलन के रूप में अपनी पहचान बनाई।

उत्तराखंड की संस्कृति और त्योहार (Culture and Festival of Uttrakhand)

उत्तराखंड की संस्कृति में त्योहारों की अधिकता है। उत्तराखंडियों ने भारत के लगभग सभी त्योहारों को उसी तरह से मनाने का अवसर प्राप्त किया है, जैसा कि बाकी भारतीय राज्य करते हैं जिसमें होली, दिवाली, नवरात्रि, क्रिसमस, दुर्गोत्सव आदि शामिल हैं। विशेष रूप से महिलाएं त्योहारों में भाग लेती हैं। महिलायें त्योहारों की तैयारियों में लगी रहती हैं। कुछ स्थानीय त्योहारों को स्थानीय लोगों के रीति-रिवाज़ों और प्रथाओं को ध्यान में रखकर मनाया जाता है। बसंत पंचमी, भिटौली, हरेला, फूलदेई, बटावित्री, गंगा दशहरा, दिक्कड़ पूजा, ओल्गी या घी संक्रांति, खतरुआ, और घुघुतिया उत्तरांचल के कुछ प्रमुख त्योहार हैं। हरेला विशेष रूप से कुमाऊँनी त्योहार है। यह मानसून के आगमन के प्रतीक ‘श्रावण’ के महीने के पहले दिन आयोजित किया जाता है।

आइये जानते हैं इन त्योहारों के बारे में –

भिटौली- ये भाइयों द्वारा अपनी बहनों को उपहार बांटने का त्योहार है, यह चैत्र के महीने में मनाया जाता है। उसी महीने के पहले दिन, फूल देई को उन गावों द्वारा देखा जाता है जो सभी गाँव के घरों में घर-घर घूमते हैं। अपने साथ वे चावल, गुड़, नारियल, हरे पत्ते और फूलों से भरी हुई प्लेट लेकर जाते हैं।

घुघुतिया त्योहार (मकर संक्रांति)- यह त्योहार कुमाऊँ क्षेत्र में माघ माह की 1 जनवरी को मनाया जाता है। स्थानीय भाषा में घुघुतिया त्योहार या ‘घुघुती’ त्यार या ‘काले-कौआ त्योहार भी’ कहा जाता है। इस त्योहार में आटे के घुघुत बनाये जाते हैं व बच्चे इन घुघुत को कौओं को खिलाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे ‘खिचड़ी’ त्योहार के रूप में मनाया जाता है।

ओलगिया (घी-संक्राति)- यह त्योहार भादों(भाद्रपद) महीने की 1 गते(संक्राति) को मनाया जाता है। इस दिन पूरे उत्तराखंड में घी खाना शुभ माना जाता है।

फूलदेई (फूल संक्राति)- यह त्योहार चैत्र मास के 1 गते (हिन्दू वर्ष का प्रथम दिन) को मनाया जाता है।
इस दिन बच्चे घर – घर जाकर देहरी पर फूलों को रखते हैं

हरेला त्योहार- यह त्योहार श्रावण माह की पहली गते को मनाया जाता है। हरेले से कुछ दिन पहले हरियाली डाली जाती है व 1 गते को हरियाली(हरेला) को काटकर देवी देवताओं को चढ़ाते हैं।

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उत्तराखंड की भाषा और साहित्य (Language and Literature)

लोकभाषाएं

गढ़वाली- गढ़वाल मंडल के सभी सातों जिलों में गढ़वाली भाषा बोली जाती है। ग्रियर्सन के अनुसार गढ़वाली के रूप। श्रीनगरिया, नागपुरिया, बधाणी, सलाणी, टिहरियाली, राठी, दसौल्या, मँझ कुमैया। गढ़वाली भाषाविद डॉ गोविंद चातक ने श्रीनगर औऱ उसके आसपास बोली जाने वाली भाषा को आदर्श  गढ़वाली कहा था।

कुमाउँनी- कुमाऊँ मंडल के सभी छः जिलों में कुमाऊँनी भाषा बोली जाती है। वैसे इनमें से लगभग हर जिले में कुमाऊँनी का स्वरूप थोड़ा बदल जाता है। गढ़वाल और कुमाऊँ के सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग दोनों भाषाओं की बोली समझ और बोल लेते हैं। कुमाऊँनी की दस उपभाषाएँ हैं।

जौनसारी- गढ़वाल मंडल के देहरादून जिले के पश्चिमी पर्वतीय क्षेत्र को जौनसार भाबर कहा जाता है। यहां की मुख्य भाषा जौनसारी है। इस क्षेत्र की सीमाएं टिहरी और उत्तरकाशी से लगी हुई हैं, इसलिए इन जिलों के कुछ हिस्सों में भी जौनसारी बोली जाती है।

बंगाणी- उत्तरकाशी जिले के मोरी तहसील के अंतर्गत पड़ने वाले क्षेत्र को बगांण कहा जाता है। इस क्षेत्र में तीन पट्टियां मासमोर, पिंगल तथा कोठीगाड़ आती हैं, जिनमें बंगाणी बोली जाती है।

मार्च्छा- गढ़वाल मंडल के चमोली जिले की नीति और माणा घाटियों में रहने वाली भोटिया जनजाति मार्च्छा और तोल्छा भाषा बोलती हैं। इस भाषा में तिब्बती के कई शब्द बोले जाते हैं।

जोहारी- यह भी भोटिया जनजाति की एक भाषा है जो पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी क्षेत्र में बोली जाती है। इन लोगों का भी तिब्बत के साथ लंबे समय तक व्यापार रहा है।

थारू- उत्तराखंड के कुमाऊँ मण्डल के तराई क्षेत्रों जैसे नेपाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ क्षेत्रों में थारू जनजाति के लोग रहते हैं। इस जनजाति के लोगों की अपनी अलग भाषा है जिसे उनके नाम पर ही थारू भाषा कहा जाता है। यह कन्नौजी ब्रज भाषा तथा खड़ी बोली का मिश्रित रूप है।

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साहित्य:

उत्तराखंड का साहित्य विश्वभर में मान्य है। यहां के साहित्यकारों ने साहित्य को नई दिशा दी है। रविंद्र नाथ टैगोर, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा ने शांत और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच ही साहित्य सृजन किया और जो साहित्य कुमाऊं की वादियों में सृजित हुआ उस साहित्य और कविता ने दुनिया में अमिट छाप छोड़ी है। देवभूमि ने ईला जोशी, शिवानी, रमेश उप्रेती, गोविंदलामा, चारुचंद्र पांडे, तारा पांडे अनेक साहित्यकारों का सृजन किया है। 1918 में विनोद समाचार पत्र का प्रकाशन भी नैनीताल से हुआ था।

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उत्तराखंड की वेशभूषा (Costumes of Uttrakhand)

उत्तराखंड के पारंपरिक परिधान

पारंपरिक रूप से उत्तराखंड की महिलाएं घाघरा व आंगड़ी और पुरुष चूड़ीदार पैजामा व कुर्ता पहनते थे। समय के साथ इनका स्थान पेटीकोट, ब्लाउज व साड़ी ने ले लिया। सर्दियों में ऊनी कपड़ों का उपयोग होता है। विवाह आदि शुभ कार्यों के अवसर पर कई क्षेत्रों में आज भी शनील का घाघरा पहनने की रवायत है। गले में गलोबंद, चर्यो, जै माला, नाक में नथ, कानों में कर्णफूल, कुंडल पहनने की परंपरा है। सिर में शीशफूल, हाथों में सोने या चांदी के पौंजी व पैरों में बिछुवे, पायजेब, पौंटा पहने जाते हैं। घर-परिवार के समारोहों में ही आभूषण पहनने की परंपरा है। विवाहित स्त्री की पहचान गले में चरेऊ पहनने से होती है। विवाह इत्यादि शुभ अवसरों पर पिछौड़ा पहनने का रिवाज भी यहां आम है।

कालांतर में शिक्षा, तकनीकी क्षेत्र में उन्नति और आवागमन के साधनों का प्रभाव वस्त्राभूषणों पर भी पड़ा। नतीजा, धीरे-धीरे लोग परंपरागत पहनावे का त्याग करने लगे। हालांकि, अब एक बार फिर लोग परंपराओं के संरक्षण के प्रति गंभीर हुए हैं और पारंपरिक वस्त्रों को आधुनिक कलेवर में ढालकर पहनने का चलन अस्तित्व में आ रहा है।

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उत्तराखंड का भोजन (Food of Uttrakhand)

वैसे तो उत्तराखंड के दोनों ही मण्डल यानि कुमाऊं और गढ़वाल में संस्कृति में कुछ भिन्नता देखने को मिलती है मगर इन दोनों ही क्षेत्रों में कुछ विशेष व्यंजनों को छोड़कर लगभग सभी भोजन समान ही दिखते हैं, बस नाम में भिन्नता है। वहीं मौसम के अनुसार भी भोजन में परिवर्तन देखने को मिलता है, जैसे सर्दियों में तिल के लड्डू या मंडवी की रोटियां पसंद की जाती हैं। वहीं गर्मी में छाज-झंगोरा, छोलिया रोटियों के साथ पसंद किया जाता है। इसके अलावा यहां उगने वाली दालों का प्रयोग भोजन में मौसम के अनुसार होता है।

उत्तराखंडियों ने सभी प्रकार के शाकाहारी भोजन के लिए अपना स्वाद विकसित किया है। गोभी, पालक, हरी चने, मटर जैसी सब्जियाँ के साथ-साथ फलों में नारंगी, आम, आड़ू, अमरूद जैसे फलों का भी सेवन किया जाता है, जो लंबे समय में उन्हें स्वस्थ रहने में मदद करते हैं।

उत्तराखंड के लोकप्रिय भोजन:

आलू के गुटके– उत्तराखंड में सबसे लोकप्रिय व्यंजनों में अगर किसी को शामिल किया जाए तो आलू के गुटके हैं। क्योंकि ये कुमाऊं और गढ़वाल दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से बनाए जाते हैं। आलू के गुटके को पूड़ी,ककड़ी और दही के रायते से साथ खाया जाता है। वहीं ये पकवान ज़्यादातर त्योहारों और शादी में भी देखने को मिलता है।

काफुली या कपा – उत्तराखंड के पारंपरिक भोजन में काफुली एक स्वादिष्ट व्यंजन है जिसे सर्दियों के मौसम में सबसे ज़्यादा पसंद किया जाता है। काफुली बनाने के लिए पालक, सरसों और मेथी को उपयोग में लाया जाता है।

गहत के पराठें – गहत के परांठे बनाने के लिए गहत को रात भर भीगाकर उबाल कर उसे पीसा जाता है। फिर उसके अंदर नमक, मिर्च मिलाकर उसे रोटी की तरह पकाया जाता है। अक्सर कई बार इसे पूड़ी जैसा भी तला जाता है जिसको कद्दू की सब्जी के साथ परोसने पर इसका स्वाद कई गुना बड़ जाता है। वहीं इसे घी, मक्खन या फिर भंगीरे की चटनी के साथ भी इसका स्वाद और लज़ीज़ बन जाता है।

कोदे की रोटी– कोदा या मंडवा की रोटी और उससे बनने वाले व्यंजनों को उत्तराखण्डी लोग काफी चाव से खाते हैं। कोदे की रोटी को चूल्हे की आग में पकाकर घर के बनें मक्खन, घी, नमक और प्याज, या फिर भंगीरे की चटनी के साथ खाया जाता है।

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उत्तराखंड के पर्यटन स्थल (Tourist Places of Uttrakhand)

देवभूमि उत्तराखंड को ढेर सारे ऋषियों ने अपनी तपस्या से सजाया है। घूमने निकलेंगे तो पूरा उत्तराखंड ही ख़ासमख़ास है। यहां की हवा इतनी निराली है कि आपका मन ही नहीं करेगा वापस आने का। घूमने वाली जगहों को आप दो हिस्सों में बांट सकते हैं- धार्मिक स्थल और रोमांचक स्थल।

उत्तराखंड के धार्मिक स्थल­­­:

श्रद्धालुओं का गढ़ है उत्तराखंड, अगर आपको 1 महीना दे दिया जाए तो भी आप उत्तराखंड पूरा नहीं घूम सकते।

हर की पौड़ी हरिद्वार– (Har Ki Pauri Haridwar)- देवों की नगरी कहे जाने वाले हरिद्वार में स्थित हर की पौड़ी घाट हरिद्वार का मुख्य आकर्षण का केंद्र है, जहां पर सूर्यास्त के समय होने वाली गंगा माता की आरती सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया में भी काफी प्रसिद्ध है। इस आरती में शामिल होने हर साल करोड़ों तीर्थयात्री हरिद्वार (Har Ki Pauri Ghat Haridwar In Hindi) में आते हैं और गंगा नदी में स्नान करते हैं, क्योंकि कहा जाता है कि हर की पौड़ी घाट पर गंगा नदी में स्नान करने वाले तीर्थयात्री को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

केदारनाथ (Kedarnath)- उत्तराखंड में स्थित केदारनाथ मंदिर तीन पहाड़ों (केदारनाथ, खर्चकुंड और भरतकुंड) से घिरे होने के साथ-साथ पांच नदियों (क्षीरगंगा, मंदाकिनी, सरस्वती, स्वर्णगौरी, और मधुगंगा) का संगम भी है। यहां पर भगवान शिव के आकृति पिण्ड की पूजा की जाती है। उत्तराखंड के पंचकेदार और चार धामों में से केदारनाथ मंदिर में सबसे ज़्यादा भीड़ होती है। केदारनाथ मंदिर (Kedarnath Temple In Hindi) जाने के लिए गौरीकुंड से करीब 16-18 किमी. का ट्रेकिंग करके जाना पड़ता है, जिसे पैदल के अलावा घोड़े, खच्चर या पालकी के द्वारा भी कम्प्लीट किया जा सकता है।

मद्महेश्वर मंदिर (Madmaheshwar Temple)- उत्तराखंड में मद्महेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर पंचकेदार के द्वितीय केदार के रूप में प्रसिद्ध है। मद्महेश्वर मंदिर में भगवान शिव के नाभी की पूजा की जाती है। पंचकेदार की यात्रा करते समय तीर्थयात्री इस मंदिर में स्थापित भगवान शिव का दर्शन करना नहीं भूलते हैं। मद्महेश्वर मंदिर (Madmaheshwar Temple In Hindi) का ट्रेक लगभग 16 किमी. का होता है, जिसे पैदल, घोड़े या खच्चर द्वारा पूरा करना होता है।

तुंगनाथ मंदिर (Tungnath Temple)- तुंगनाथ मंदिर को उत्तराखंड के तृतीय केदार के रूप में जाना जाता है, जहां पर भगवान शिव के हृदय और भुजाओं की पूजा की जाती है। यह मंदिर चोपता (मिनी स्वीटजरलैंड) से करीब 3.5 किमी. की दूरी पर स्थित है। चोपता से तुंगनाथ मंदिर (Tungnath Temple In Hindi) जाने के लिए आप पैदल ट्रेक की जगह घोड़े या खच्चर की सुविधा भी ले सकते हैं।

रुद्रनाथ मंदिर (Rudranath Temple)- उत्तराखंड के चतुर्थ केदार के रूप में प्रसिद्ध इस मंदिर में भगवान शिव के एकानन यानी मुख की पूजा होती है। रुद्रनाथ मंदिर में भगवान शिव की पूजा शिवलिंग की नहीं, बल्कि उनकी पूजा प्रतिमा के रूप में की जाती है और उस प्रतिमा को स्वयंभू यानी खुद से प्रकट हुई प्रतिमा मानी जाती है। रुद्रनाथ मंदिर (Rudranath Temple In Hindi) की चढ़ाई करीब 22-24 किमी. है, जिसे आप पैदल, घोड़े या खच्चर की सुविधा लेकर पूरा कर सकते हैं।

कल्पेश्वर मंदिर (Kalpeshwar Temple)- इस मंदिर को उत्तराखंड के अंतिम यानी पांचवे केदार के रूप में जाना जाता है, जहां पर भगवान शिव की जटा की पूजा की जाती है। कल्पेश्वर मंदिर (Kalpeshwar Temple In Hindi) जाने के लिए थोड़ा-सा भी ट्रेक नहीं करना पड़ता, क्योंकि इस मंदिर से मात्र 300 मीटर पहले तक गाड़ियां चलती हैं, इसलिए इस मंदिर को पंचकेदार का सबसे आसानी से दर्शन होने वाला मंदिर माना जाता है।

बद्रीनाथ – (Badrinath Temple) बद्रीनाथ मंदिर उत्तराखंड के सबसे आकर्षित तीर्थयात्रा में से एक है। बद्रीनाथ मंदिर में बद्रीनारायण की पूजा की जाती है, जिन्हें भगवान विष्णु का एक रूप माना जाता है। बद्रीनाथ मंदिर (Badrinath Temple In Hindi) में जाने के लिए भी ट्रेक नहीं करना पड़ता, क्योंकि इस मंदिर के बिल्कुल निकट तक कोई भी गाड़ी बिना किसी परेशानी के पहुंच जाती है।

गंगोत्री मंदिर (Gangotri Temple)- यह मंदिर गंगा माता को समर्पित है। मंदिर की ऊंचाई लगभग 20 फीट है, जिसके अंदर गंगा माता की प्रतिमा स्थापित की गई है। गंगोत्री मंदिर जाने के लिए ट्रेक नहीं करना पड़ता। बाइक, कार, टेक्सी, जीप और बस वगैरह सभी इस मंदिर के एकदम नज़दीक तक जा सकती हैं। गंगोत्री मंदिर से ही गौमुख का ट्रेक स्टार्ट होता है। अगर आप चाहें तो गंगा माता के दर्शन करने के बाद गौमुख का ट्रेक भी स्टार्ट कर सकते हैं, जो गंगोत्री मंदिर (Gangotri Temple In Hindi) से करीब 18 किमी. का ट्रेक होता है।

यमुनोत्री मंदिर (Yamunotri Temple)- यमुनोत्री मंदिर उत्तराखंड के चार धामों का एक हिस्सा है, जहां पर मंदिर में स्थापित यमुना माता की प्रतिमा की पूजा की जाती है। यमुनोत्री मंदिर (Yamunotri Temple In Hindi) जाने के लिए लगभग 6 किमी. का ट्रेक करना पड़ता है, जो इस मंदिर के सबसे नजदीकी सड़क मार्ग जानकी चट्टी, जहां तक गाड़ी पहुंच जाती है, से शुरू होता है।

धनौल्टी में स्थित माता सुरकंडा देवी मंदिर (Mata Surkanda Devi Temple)- धनौल्टी में स्थित माता सुरकंडा देवी मंदिर को 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को 51 भागों में बांट दिया था, तो यहां पर माता सती का सिर गिरा था और तभी से इन्हें सुरकंडा देवी (Mata Surkanda Devi Temple In Hindi) के नाम से जाना जाता है। चंबा-मसूरी सड़क मार्ग पर स्थित यह मंदिर नजदीकी कस्बे कद्दूखाल से करीब 2.5 किमी. की दूरी पर स्थित है और इस 2.5 किमी. की दूरी को ट्रेक करके कंप्लीट करना पड़ता है।

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उत्तराखंड के रोमांचक स्थल­­­­­­­­­­­:

देहरादून (Dehradun)- यहां के हरे-भरे पेड़, नीला आसमान, सर्द मौसम, बढ़िया खाना, ये सब कुछ ट्रिप को मज़ेदार बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ते। हिमालय की तलहटी में बसा देहरादून, जो उत्तराखंड की राजधानी है, अपनी खूबसूरत जलवायु और सुंदर परिदृश्य के लिए जाना जाता है। उत्तराखंड राज्य में गढ़वाल हिमालय की चोटी पर स्थित देहरादून (Dehradun In Uttarakhand In Hindi) समुद्र तल से 1400 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

मसूरी और नैनीताल (Mussoorie and Nainital)- मसूरी पर्यटक स्थल दुनियाभर के पर्यटकों को अपनी विशेषताओं की वजह से बेहद आकर्षित करता है। यहां आप हर साल हज़ारों लाखों में सैलानियों को देख सकते हैं। मसूरी को “क्वीन ऑफ द हिल्स” के नाम से भी जाना जाता है। मसूरी की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 7000 फीट है। तो वही बात करें नैनीताल की, नैनीताल हिल स्टेशन भी उत्तराखंड राज्य के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में से एक है। नैनीताल को ‘नैनी झील’ के नाम से भी जाना जाता है। नैनीताल अपनी एडवेंचर एक्टिविटीज़ के लिए भी बेहद प्रसिद्ध है।

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क (Jim Corbett National Park)- जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क उत्तराखंड राज्य में हिमालय की तलहटी के बीच स्थित एक खूबसूरत नेशनल पार्क है। ये नेशनल पार्क (Jim Corbett National Park In Uttarakhand In Hindi) भारत के सबसे पुराने राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है, जिसकी स्थापना वर्ष 1936 में हैली नेशनल पार्क के रूप में गयी थी। आपको बता दें इस पार्क में रॉयल बंगाल टाइगर की लुप्तप्राय प्रजातियों का निवास स्थान है। इसके अलावा इस पार्क में 580 पक्षियों की प्रजातियां, 50 प्रजातियों के पेड़ और जानवरों की लगभग 50 प्रजातियां तथा 25 सरीसृप प्रजातियां मौजूद हैं।

रानीखेत (Ranikhet)- रानीखेत उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय आकर्षणों में से एक है जो कुछ बेहतरीन प्राकृतिक दृश्यों और प्राकृतिक सुंदरता से समृद्ध है। उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित, ये जगह आपको शहर की भीड़-भाड़ से दूर लाकर खड़ा कर देती है। ये हिल स्टेशन हिमालय का मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहां आपको शांतिपूर्ण वातावरण भी देखने को मिलेगा। रानीखेत (Ranikhet in Uttarakhand in Hindi) सेब के बागों, खुबानी और देवदार के पेड़ों से घिरे कुछ सबसे खूबसूरत बगीचों का घर है। इसमें घने जंगल और खूबसूरत झरने भी हैं जो पर्यटकों को बेहद आकर्षित करते हैं।

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