Azad Hind Fauj : जानिए कहां और कैसे हुई थी ‘आज़ाद हिंद फौज’ की स्थापना?

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Azad hind fauj history – रासबिहारी बोस ने जापानियों के प्रभाव और सहायता से दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा क़रीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू किया था, जिसे  आज़ाद हिन्द फ़ौज का नाम दिया गया। बाद में उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आज़ाद हिन्द फौज़ का सर्वोच्च कमाण्डर नियुक्त कर दिया था और उनके हाथों में इसकी पूरी कमान सौंप दी थी। तो चलिए आपको बताते हैं कहां और कैसे हुई थी ‘आजाद हिंद फौज’ की स्थापना?

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Azad hind fauj history – कैसे हुई थी ‘आजाद हिंद फौज’ की स्थापना?

  • अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई को तेज़ करने के लिए आज़ाद हिंद फौज की स्थापना की गई थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान साल 1942 में भारत को अंग्रेजों के कब्ज़े से स्वतंत्र कराने के लिये आज़ाद हिन्द फौज (इन्डियन नेशनल आर्मी, INA) नामक सशस्त्र सेना का गठन किया गया।
  • इसकी स्थापना रासबिहारी बोस ने जापान की सहायता से टोकियो में की थी। शुरुआत में इस फौज़ के अंदर उन भारतीय सैनिकों को लिया गया था जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिए गए थे। कुछ समय बाद इसमें बर्मा और मलाया में स्थित भारतीय स्वयंसेवक की भी भर्ती की गई।
  • एक साल बीत जाने के बाद यानी कि साल 1943 में सुभाष चन्द्र बोस जापान पहुंचे और वहां पहुंचकर उन्होंने टोकियो रेडियो से घोषणा करते हुए कहा कि अंग्रेजों से यह आशा करना बिल्कुल व्यर्थ है कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड़ देंगे। हमें भारत के अंदर व बाहर से स्वतंत्रता के लिए स्वयं (खुद) संघर्ष करना होगा।

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  • नेताजी के इस भाषण से रासबिहारी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने 4 जुलाई 1943 को सुभाष चंद्र बोस को फौज का नेतृत्व सौंप दिया। इसके बाद 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हॉल के सामने नेताजी ने ‘सुप्रीम कमाण्डर’ के रूप में सेना को सम्बोधित किया और उन्हें “दिल्ली चलो” का नारा दिया।
  • इसके कुछ महीनों बाद 21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में अस्थायी भारत सरकार ‘आज़ाद हिन्द सरकार’ की स्थापना की। नेताजी इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष तीनों थे।
  • इस सरकार को जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी। सुभाष चंद्र का मानना था कि अंग्रेजों के म़जबूत शासन को केवल सशस्त्र विद्रोह के ज़रिए ही चुनौती दी जा सकती है।
  • 4 फ़रवरी 1944 को आज़ाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया।

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  • 21 मार्च 1944 को ‘चलो दिल्ली’ के नारे के साथ आज़ाद हिंद फौज का हिन्दुस्तान की धरती पर आगमन हुआ।
  • इसके बाद 22 सितम्बर 1944 को शहीदी दिवस मनाते हुए नेताजी ने अपने सैनिकों से मार्मिक शब्दों में कहा कि हमारी मातृभूमि स्वतंत्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। यह स्वतंत्रता की देवी की मांग है।
  • इसके कुछ समय बाद हवाई दुर्घटना में सुभाष चंद्र बोस का निधन हो गया और उनका सैनिक अभियान असफल हो गया। आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों की संख्या के बारे में थोड़े बहुत मतभेद रहे हैं, ज़्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि इस सेना में लगभग चालीस हज़ार सेनानी थे।

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