Brihaspativar ki vrat katha pdf: यहां पढ़ें गुरुवार व्रत की कथा, होगी हर मनोकामना पूरी

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Brihaspativar ki vrat katha pdf – Brihaspativar ki vrat katha pdf download- Guruwar Vrat Katha PDF in Hindi – thursday vrat katha pdf download – Guruvar Vrat Katha – बृहस्पति देव को बुद्धि और शिक्षा का कारक माना जाता है। गुरुवार को बृहस्पति देव की पूजा – अर्चना करने से धन की प्राप्ति होती है। इस दिन बृहस्पति देव की कथा सुनना शुभ माना जाता है। तो चलिए यहां पढ़िए बृहस्पतिदेव की कथा,  गुरूवार व्रत की कथा।

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प्राचीन काल की बात है एक नगर में बड़ा ही प्रतापी तथा दानवीर राजा रहता था। वह प्रत्येक गुरुवार को व्रत तथा कथा का वाचन करता था लेकिन राजा के इस धार्मिक स्वभाव से रानी खुश नहीं थी। वह एक भी रूपया दान में देना नहीं चाहती थी। एक दिन राजा शिकार के लिए वन में चले गए, उनके पीछे से महल में बृहस्पति देव साधू का रूप धारण करके भिक्षा मांगने आए। साधू के भिक्षा मांगने पर रानी बोली, “हे साधू महाराज, मैं इस दान पुण्य से अब तंग आ चुकी हूं, आप मुझे कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे कि यह सारा धन नष्ट हो जाए व मैं आराम से रह सकूं।” इस पर बृहस्पति देव ने कहा, “हे रानी, आप अति विचित्र हैं। आपके पास यदि अधिक धन है तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ और पुण्य कमाओ, धन का कुशल प्रयोग करो। साधू की यह बातें रानी को अच्छी नहीं लगी और उन्होंने कहा कि ” मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं, जिसे मैं संभाल ना पाऊं।” इस बात पर बृहस्पतिदेव ने रानी से कहा,” यदि आपकी यही इच्छा है तो आप वैसा करें जैसा मैं बताता हूं। गुरुवार के दिन अपने घर को गोबर से लीपना, इसके बाद अपने केशों को गीली मिट्टी से धोना, स्नान करना, इसके बाद राजा से हजामत करने को कहना, भोजन में मांस खाना, धोबी के यहां कपड़े धुलने के लिए देना। ऐसा तुम सात गुरुवार तक नियम से करना। यह कहकर बृहस्पति देव अन्तर्ध्यान हो गए।Brihaspativar ki vrat katha pdf

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साधू के कहने पर रानी ने तीन गुरुवार नियम से ऐसा किया और उनकी सारी धन संपत्ति समाप्त हो गई। राजा रानी भोजन तक को तरसने लगे। ऐसे में राजा नगर के बाहर धन कमाने के लिए निकल पड़ा। राजा लकड़ी काटकर शहर में जाकर बेचता तथा अपना जीवनयापन करता। इधर घर में रानी और दासी भी परेशान रहने लगी। एक दिन राजा की पुत्री ने उससे दही खाने का आग्रह किया लेकिन राजा के पास इतने रुपए नहीं थे। ऐसे में राजा अपनी पुत्री को आश्वासन देकर जंगल लकड़ी काटने चला गया और रोने लगा। उस दिन बृहस्पति वार था। बृहस्पति देव साधू का रूप धारण करके उसके पास गए और उससे उसके दुख का कारण पूछा। राजा ने अपनी सारी कहानी रोते हुए व्यक्त की। इस पर साधू कहते हैं कि बेटा तुम्हारा यह हाल तुम्हारी पत्नी द्वारा बृहस्पति देव के निरादर करने से हुआ है लेकिन तुम चिंता मत करो। हर बृहस्पतिवार को भगवान ब्रहस्पति देव का पाठ करते हुए, दो पैसे के चने, गुड़ तथा पात्र में जल भरकर उनका स्मरण करो। समस्त परिवार में प्रसाद बांटो तथा स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करो। बृहस्पतिदेव सब भला करेंगे। इस पर राजा बोला कि मेरे पास अपनी पुत्री को दही खिलाने तक के रुपए नहीं हैं। इस पर साधू ने उसे लकड़ी शहर में बेचने का उपाय बताया। वह अगले दिन जंगल से लकड़ी काटकर शहर में बेचता है जहां उसे पहले से ज़्यादा पैसे मिलते हैं। लौटते समय वह अपनी पुत्री के लिए दही तथा पूजा का सामान ले आता है। उस दिन पूजा के बाद उसकी परेशानियां कम होने लगी लेकिन अगले ही बृहस्पतिवार को वह पूजा, व्रत करना भूल जाता है।

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एक दिन उस नगर के राजा ने अपने महल में यज्ञ कराया तथा नगर के सभी लोगों के भोजन का आयोजन किया। व्यापारी राजा तथा रानी दोनों ही भोजन के समय से देर में पहुंचते हैं इसलिए राजा उन दोनों को महल के अंदर भोजन कराते हैं। जब वह दोनों जाने लगते हैं तभी रानी की आवाज़ आती है कि किसी ने उनका हार गायब कर लिया है। राजा को उन दोनों पर संदेह होता है जिसके बाद वह इन्हें बंदी बनाकर कारावास में डाल देते हैं। वहां दोनों ही अत्यंत दुखी होते हैं तथा बृहस्पतिदेव का स्मरण करते हैं। इसी बीच बृहस्पतिदेव उन्हें उनकी भूल का स्मरण कराते हैं तथा गुरुवार के दिन वहीं गुड़, चने मंगवाकर पूजा करने की सलाह देते हैं। इसके बाद बृहस्पतिवार के दिन उन्हें कारागार के पास दो पैसे मिलते हैं। बाहर सड़क में एक स्त्री से उन्होंने कहा कि आप हमारे लिए गुड़, चने ला दीजिए। हमें बृहस्पतिदेव की पूजा करनी है। उस स्त्री ने यह कहकर मना कर दिया कि अभी मैं अपनी बहू के लिए गहने लेने जा रही हूं मेरे पास समय नहीं है। इतना कहकर वो वहां से चल दी। इसके बाद उस सड़क से दूसरी स्त्री गुजरी दोनों ने उससे आग्रह किया तो वह बोली कि मैं अपने बेटे के लिए कफ़न लेने जा रही हूं परंतु अब मैं तुम्हारे लिए पहले गुड़ चना लेकर आऊंगी। वह बृहस्पतिदेव की पूजा का सामान ले आती है। राजा रानी मिलकर भगवान की पूजा करते हैं। उस स्त्री को भी प्रसाद देते हैं। इसके पश्चात् वह स्त्री कफ़न लेकर जब घर आती है तो उसके पुत्र को श्मशान भूमि ले जाया जा रहा था। स्त्री बोली कि, मुझे पहले अपने बेटे का मुंह देख लेने दो। उसके चेहरे से सफेद चादर हटाई और उसने अपने बेटे के मुंह में बृहस्पतिदेव का प्रसाद डाल दिया। प्रसाद और पंचामृत के प्रभाव से उसका पुत्र पुनः जीवित हो गया।

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इसके अतिरिक्त, पहली महिला जिसने राजा रानी को गुड़ तथा चना लाने से मना कर दिया था। उसके पुत्र की शादी में वह घोड़ी पर बैठा, तब घोड़ी ने उछाल मारी और लड़का गिर गया तथा उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उसकी मां अर्थात वह पहली महिला बिलख – बिलख कर रोने लगी। उसने बृहस्पतिदेव का स्मरण किया। बृहस्पति देव साधू वेश में पहुंचकर, उस स्त्री से कहते हैं हे देवी आपको विलाप करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आपने बृहस्पतिदेव का अनादर किया है। अब जाकर उस भक्त से क्षमा याचना करो तथा कथा का श्रवण करो। वह स्त्री उस कारागार में जाती है तथा राजा से क्षमा याचना करती है इसके बाद वह सब बृहस्पतिदेव की कथा करके प्रसाद ग्रहण करते हैं।

घर जाकर वह यही प्रसाद अपने पुत्र के मुख में डालती है, इसके प्रभाव से उसका मृत पुत्र भी जीवित हो उठता है। उसी रात बृहस्पतिदेव राजा के सपने में आते हैं, और उनसे कहते हैं कि “हे राजन्, तुम्हारी रानी का हार खूंटी पर टंगा है। तुमने जिन्हें बंधी बनाया है वह निर्दोष हैं। अब उन्हें रिहा करो।”

अगली सुबह राजा ने उन दोनों को कारागार से मुक्त किया। आधा राज पाट देकर विदा किया। इस प्रकार बृहस्पतिदेव की कृपा से सबका कल्याण होता है।

जय बृहस्पतिदेव।।

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