जाने गुरु पूर्णिमा का क्या महत्व है

Guru Purnima 2018—आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रुप में पूरे देश में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है | हिंदू धर्म में इस दिन का बहुत महत्व है| हिंदू कैलेंडर के अनुसार हर महीने पूर्णिमा आती है, लेकिन आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा इनमें अपना विशेष महत्व रखती है|ऐसा माना जाता है कि गुरु पूर्णिमा के दिन ही गौतम बुद्ध ने उत्तर प्रदेश में सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था|

Guru Purnima 2018

 गुरु का अर्थ

 

  • ‘गुरु’ शब्द संस्कृत के दो शब्दों ‘गू’ और ‘रू’ से मिलकर बना है, ‘गू’ का अर्थ होता है अंधेरा या अज्ञानता और ‘रू’ का तात्पर्य है ‘निवारण’ यानी गुरु का अर्थ हुआ एक ऐसा व्यक्ति जो अज्ञानता रूपी अंधकार को जीवन से मिटा दे|
  • गुरु पूर्णिमा के दिन लोग अपने गुरु की पूजा करते हैं और उनका आर्शीवाद लेते हैं| भारत में इस पर्व का खास महत्व है|
  • भारत के अलावा पड़ोसी देश नेपाल में भी इसे बड़े पैमाने पर मनाया जाता है| नेपाल में गुरु पूर्णिमा के दिन राष्ट्रीय अवकाश रहता है और इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है|

 

महत्व

 

  • आज के दिन ऋषि पराशर और सत्यवती के घर महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास का जन्म हुआ था इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं| वह संस्कृत के प्रकांड विद्वान तो थे ही, साथ ही उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी, जिसके चलते उनका नाम वेद व्यास भी पड़ा|
  • उन्हें आदिगुरु के नाम से भी जाना जाता है और  उनके सम्मान में ही गुरु पूर्णिमा को मनाया जाता है|

 

guru purnima shlok

 

पूजा के लिए शुभ मुहूर्त

 

  • गुरु पूर्णिमा के दिन रात्रि में इस सदी का सबसे लंबा पूर्ण चंद्रग्रहण लग रहा है। ज्योतिषियों के अनुसार चंद्र ग्रहण भले ही 27 जुलाई की रात में लग रहा है, लेकिन इसका सूतक काल दोपहर 2.55 पर प्रारंभ हो जायेगा। इसका अर्थ है कि गुरु पूजन इस समय से पहले ही करना होगा।
  • इसके साथ ही सुबह 10:30 से दोपहर 12:00 बजे तक राहुकाल है। राहुकाल के दौरान भी गुरु पूजन नहीं किया जा सकता। ऐसे में गुरु की पूजा सुबह 5 बजे से लेकर सुबह 10:29 बजे तक या दोपहर 12:01 मिनट से 2:54 बजे तक ही कर सकते हैं।
  • इस दिन पूजा करने के लिए सबसे पहले सुबह उठकर घर की साफ सफाई कर लें और फिर स्नान कर साफ कपड़े पहनें। इसके बाद घर के मंदिर में पटरे पर सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर 12 रेखाओं से व्यास पीठ बनाएं।
  • उसके बाद दोनों हाथ जोड़कर मंत्र का जाप करें । अब दसों दिशाओं में अक्षत यानि चावल छिंड़कें और व्यासजी, ब्रह्माजी, और अपने आराध्य गुरु के नाम से पूजा का आवाहन करें। अंत में गुरु को प्रणाम करें।

 

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याद रखें इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

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