Gyanvapi Masjid History in Hindi – जानिए ज्ञानवापी मस्जिद का प्राचीन इतिहास क्या है?

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Gyanvapi Masjid History in Hindi Gyanvapi Mosque ka itihaas – इस साल अप्रैल 2022 में वाराणसी की एक निचली अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) को ज्ञानवापी परिसर के सर्वेक्षण का आदेश दिया, जिसके बाद इसका सर्वे हो पाया। वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे के बाद शिवलिंग मिलने का दावा पेश किया गया है। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष की ओर से कहा जा रहा है कि वहां मिला शिवलिंग वज़ूख़ाने में लगा एक फ़व्वारा है। इसके बाद स्थानीय अदालत ने उस जगह को सील करने का आदेश दिया है। वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर और उससे सटी ज्ञानवापी मस्जिद, दोनों के निर्माण और पुनर्निमाण को लेकर स्पष्ट और पुख़्ता ऐतिहासिक जानकारी काफ़ी कम है। आम मान्यता है कि काशी विश्वनाथ मंदिर को मुगल शासक औरंगज़ेब ने तुड़वा दिया था और वहां मस्जिद बना दी गई, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को देखने-समझने पर ये मामला इससे कहीं अधिक पेचीदा दिखाई पड़ता है। तो चलिए जानते हैं ज्ञानवापी मस्जिद का प्राचीन इतिहास क्या हैGyanvapi Masjid History in Hindi

Gyanvapi Masjid History in Hindi

इतिहासकार और ऐतिहासिक दस्तावेज़

वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद के निर्माण और विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने के संबंध में औरंगज़ेब के आदेश को लेकर कई तरह की धारणाएँ हैं लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज़ से ये बातें प्रमाणित नहीं होती। कुछ इतिहासकारों के अनुसार ज्ञानवापी मस्जिद को 14वीं सदी में जौनपुर के शर्की सुल्तानों ने बनवाया था और इसके लिए उन्होंने पहले से मौजूद विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाया था लेकिन कई इतिहासकार इससे सहमत नहीं हैं। इसका कारण वे शर्की सुल्तानों की ओर से कराए गए किसी भी निर्माण कार्य और मंदिर तोड़े जाने के किसी साक्ष्य का न होना बताते हैं। जहां तक विश्वनाथ मंदिर के निर्माण का सवाल है तो इसका श्रेय अकबर के नवरत्नों में से एक राजा टोडरमल को जाता है। राजा टोडरमल ने साल 1585 में अकबर के आदेश पर दक्षिण भारत के विद्वान नारायण भट्ट की सहायता से इस मंदिर का नवनिर्माण कराया था। दूसरी ओर, इस बात को ऐतिहासिक तौर पर भी माना जाता है कि ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण मंदिर टूटने के बाद ही हुआ और मंदिर तोड़ने का आदेश औरंगज़ेब ने ही दिया था।

Gyanvapi Masjid History in Hindi – ज्ञानवापी मस्जिद के इतिहास को लेकर इतिहासकारों ने क्या कुछ कहा

प्रोफ़ेसर डॉक्टर राजीव द्विवेदी – “विश्वनाथ मंदिर का निर्माण राजा टोडरमल ने कराया, इसके ऐतिहासिक प्रमाण हैं, टोडरमल ने इस तरह के कई और निर्माण भी कराए हैं। एक बात और यह काम उन्होंने अकबर के आदेश से कराया, यह बात भी ऐतिहासिक रूप से पुख्ता नहीं है। राजा टोडरमल की हैसियत अकबर के दरबार में ऐसी थी कि इस काम के लिए उन्हें अकबर के आदेश की ज़रूरत नहीं थी।”

इतिहासकार एलपी शर्मा– अपनी पुस्तक ‘मध्यकालीन भारत’ के पृष्ठ संख्या 232 पर उन्होंने लिखा है कि, “1669 में सभी सूबेदारों और मुसाहिबों को हिन्दू मंदिरों और पाठशालाओं को तोड़ने की आज्ञा दी थी। इसके लिए एक पृथक विभाग भी खोला गया। यह तो संभव नहीं था कि हिन्दुओं की सभी पाठशालाएं और मंदिर नष्ट कर दिए जाते परंतु बनारस का विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का केशवदेव मंदिर, पटना का सोमनाथ मंदिर और प्राय: सभी बड़े मंदिर खास तौर पर उत्तर भारत के मंदिर इसी समय तोड़े गए।”

प्रोफ़ेसर हेरम्ब चतुर्वेदी- मथुरा के केशवराय मंदिर को तोड़े जाने के आदेश के बारे में तो समकालीन इतिहासकारों ने लिखा है लेकिन विश्वनाथ मंदिर को तोड़े जाने के आदेश का ज़िक्र नहीं है। उनके मुताबिक, “साक़ी मुस्तईद ख़ां और सुजान राय भंडारी जैसे औरंगज़ेब के समकालीन इतिहासकारों ने भी इस बात का ज़िक्र नहीं किया है जबकि इनके विवरणों को उस काल का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज़ माना जाता है। ऐसा लगता है कि औरंगज़ेब के बाद आने वाले विदेशी यात्रियों के विवरणों से ही यह बात आगे बढ़ी होगी लेकिन सबसे पहले किसने ज़िक्र किया है, यह बताना मुश्किल है।”

वे आगे कहते हैं, “मस्जिद निर्माण का कोई दस्तावेज़ी प्रमाण नहीं है और मस्जिद का नाम ज्ञानवापी हो भी नहीं सकता। ऐसा लगता है कि ज्ञानवापी कोई ज्ञान की पाठशाला रही होगी। पाठशाला के साथ मंदिर भी रहा होगा जो प्राचीन गुरुकुल परंपराओं में हमेशा हुआ करता था। उस मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनी तो उसका नाम ज्ञानवापी पड़ गया, ऐसा माना जा सकता है।”

वरिष्ठ पत्रकार योगेंद्र शर्मा- “अकबर के समय में टोडरमल ने मंदिर बनवाया। करीब सौ साल बाद औरंगज़ेब के समय में मंदिर ध्वस्त हुआ और फिर आगे लगभग 125 साल तक यहां कोई विश्वनाथ मंदिर नहीं था। साल 1735 में इंदौर की महारानी देवी अहिल्याबाई ने वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया।”

वे आगे कहते हैं, “पुराणों में जिस विश्वनाथ मंदिर का ज़िक्र मिलता है, उसका इस मंदिर से कोई संबंध नहीं है, इतिहासकारों के पास इसका कोई सीधा जवाब नहीं है। ज्ञानवापी के पास आदिविश्वेश्वर मंदिर के बारे में ज़रूर कहा जाता है कि यह वही मंदिर है, जिसका पुराणों में वर्णन है। मंदिर टूटने के बाद ही मस्जिद बनी और ज्ञानवापी कूप के नाम पर मस्जिद का भी नाम ज्ञानवापी पड़ा, ज्ञानवापी कूप आज भी मौजूद है।”

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ज्ञानवापी मस्जिद के निर्माण का समय

मस्जिद के निर्माण के भी कोई पुख़्ता सबूत नहीं हैं। इसका निर्माण समय भी दावों पर आधारित है। कई लोग इस मस्जिद का निर्माण सन् 1669 बताते हैं जिनमें अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी के संयुक्त सचिव सैयद मोहम्मद यासीन का भी यही दावा है, लेकिन इसका कोई ऐतिहासिक साक्ष्य कहीं उपलब्ध नहीं है जो सैयद मोहम्मद यासीन के दावे की पुष्टि कर सके। ज्ञानवापी मस्जिद का पहला ज़िक्र 1883-84 में मिलता है। तब इसका राजस्व दस्तावेज़ों में दर्ज नाम जामा मस्जिद ज्ञानवापी था।

सैयद मोहम्मद यासीन कहते हैं, “मस्जिद में उससे पहले की कोई चीज़ नहीं है जिससे बात स्पष्ट हो सके कि इसका निर्माण कब हुआ। राजस्व दस्तावेज़ ही सबसे पुराना प्रमाण है। इसी के आधार पर साल 1937 में उसका फैसला भी आया था और इसे मस्जिद के तौर पर अदालत ने स्वीकार किया था।”

मंदिर तोड़ उसके अवशेषों पर मस्जिद निर्माण

काशी विश्वनाथ मंदिर मामले के दावों का समर्थन करने वाले विजय शंकर रस्तोगी कहते हैं कि “औरंगज़ेब ने अपने शासन के दौरान काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने का फ़रमान जारी किया था। उस समय औरंगज़ेब नें मस्जिद बनाने का फ़रमान नहीं दिया था। रस्तोगी के मुताबिक, बाद में मंदिर के अवशेषों पर ही मस्जिद बनाई गई है।” मस्जिद बनने के ऐतिहासिक साक्ष्य स्पष्ट नहीं हैं लेकिन इतिहासकार प्रोफ़ेसर राजीव द्विवेदी कहते हैं कि मंदिर टूटने के बाद यदि मस्जिद बनी है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं, क्योंकि ऐसा उस दौर में कई बार हुआ था।

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उपासना स्थल क़ानून, 1991 और ज्ञानवापी मस्जिद पर याचिकायें

18 सितंबर 1991 में बने इस क़ानून के मुताबिक, 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी अन्य धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। उनका नियंत्रण जिसके पास है, उसी के पास रहेगा। उनके धार्मिक स्वरूप और संरचना में किसी भी तरह का बदलाव नहीं हो सकता। यदि कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। अयोध्या मामले को इस क़ानून के दायरे से बाहर रखा गया था क्योंकि अयोध्या से जुड़ा मुक़दमा आज़ादी के पहले से अदालत में लंबित था। साल 1991 में सर्वेक्षण के लिए अदालत गये याचिका कर्ता हरिहर पांडेय बताते हैं, कि साल 1991 में हम तीन लोगों ने ये मुक़दमा दायर किया था। इस मुक़दमे के दायर होने के कुछ दिनों बाद ही मस्जिद प्रबंधन कमेटी ने केंद्र सरकार की ओर से बनाए गए उपासना स्थल क़ानून, 1991 का हवाला देकर इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसपर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साल 1993 में स्टे लगाकर यथास्थिति क़ायम रखने का आदेश दिया था लेकिन स्टे ऑर्डर की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद साल 2019 में वाराणसी कोर्ट में फिर से इस मामले में सुनवाई शुरू हुई और इसी सुनवाई के बाद मस्जिद परिसर के पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंज़ूरी दी गई।

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