राजस्थान का अनूठा करणी माता मंदिर, जहां भक्तों को बांटा जाता है चूहों का जूठा प्रसाद

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Karni mata ke mandir ki kahani बीकानेर में स्थित करणी माता का मंदिर चूहों के मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर पूरे भारत में बहुत फेमस है। यहाँ दूर-दूर से पर्यटक दर्शन करने के लिए आते हैं। ऐसा माना जाता है कि यहाँ करीब 20,000 काले चूहे रहते हैं। यह जगह बीकानेर से 30 किमी. दक्षिण में देशनोक में स्थित है। तो चलिए आपको इस मंदिर की कथा और इतिहास के बारे में बताते हैं। karni mata ke mandir ki kahani

Karni mata ke mandir ki kahani – करणी माता मंदिर के बारे में

करणी माता मंदिर की कहानी – Karni mata ke mandir ki kahani

  • करणी माता का मन्दिर एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है जो राजस्थान के बीकानेर जिले में है। इसमें देवी करणी माता की मूर्ति स्थापित है। यह बीकानेर से 30 किलोमीटर दक्षिण दिशा में देशनोक में स्थित है।
  • इस मंदिर का निर्माण बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने 15वीं-20 वीं शताब्दी में करवाया था। इस मंदिर को मुगल शैली में सुंदर पत्थरों से बनाया गया है|
  • करणी माता का जन्म चारण कुल में होने के कारण यह मंदिर चूहों का मंदिर भी कहलाया जाता है। करणी माता को माँ जगदम्बा का अवतार माना जाता है।  
  • मंदिर के मुख्य द्वार पर संगमरमर से नक्काशी की गयी है और चांदी के दरवाज़े बनाये गए हैं। यहाँ चूहों के प्रसाद के लिए चांदी की बड़ी थाली भी देखने लायक है। 
  • इन चूहों को पवित्र माना जाता है और इन्हें “काबा” कहा जाता है। इतने चूहे होने के बाद भी मंदिर में आज तक कोई भी बीमारी नहीं फैली, यहाँ तक कि चूहों का झूठा प्रसाद खाने से कोई भी भक्त बीमार नहीं हुआ है।
  • चूहे पूरे मंदिर में मौजूद रहते हैं। वे श्रद्धालुओं के शरीर पर कूद-फांद करते हैं, लेकिन किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। चील, गिद्ध और दूसरे जानवरों से इन चूहों की रक्षा के लिए मंदिर में खुले स्थानों पर बारीक जालियां लगी हुई हैं।
  • यहाँ सुबह पांच बजे मंगला आरती और सायं सात बजे आरती के समय चूहों का जुलूस तो देखने लायक होता है|
  • एक कथा के अनुसार 150 साल की उम्र में जब माँ करणी की मृत्यु हुई थी तब वह मरने के बाद चूहे के रूप में परिवर्तित हो गयी थी।  

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माँ जगदम्बा के करणी अवतार की कहानी Karni mata ke mandir ki kahani

  • करणी माता को माँ जगदम्बा का अवतार माना जाता है। उनका जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ। उनके बचपन का नाम रिघुबाई था। 
  • रिघुबाई की शादी साठिका गाँव के किपोजी चारण से हुई थी लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही वह सांसारिक माया से दूर हो गयी इसलिए उन्होंने किपोजी चारण की शादी अपनी छोटी बहन गुलाब से करवाकर खुद को माता की भक्ति और लोगों की सेवा में लगाया।
  • जनकल्याण, अलौकिक कार्य और चमत्कारिक शक्तियों के कारण रिघुबाई को करणी माता के नाम से स्थानीय लोग पूजने लगे। वर्तमान में जहाँ यह मंदिर है वहां पर एक गुफा में करणी माता अपनी इष्ट देवी की पूजा करती थी। यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में मौजूद है। ऐसा माना जाता है करणी माता 151 वर्ष जिन्दा रहकर 23 मार्च 1538 को ज्योतिर्लिंग हुई। उनके ज्योतिर्लिंग होने के पश्चात भक्तों ने उनकी मूर्ति की स्थापना कर के उनकी पूजा शुरू की, जो अब तक चली आ रही है।

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चूहों को बच्चे मानती थी करणी माता Karni mata ke mandir ki kahani

  • करणी माता को बीकानेर राजघराने की कुलदेवी भी कहा जाता है। कुछ किवदंतियों के अनुसार माँ करणी के आशीर्वाद से ही बीकानेर और जोधपुर रियासत की स्थापना हुई थी। एक कथा के अनुसार माँ करणी चूहों को संतान मानती थी।  
  • एक बार करणी माता का सौतेला पुत्र लक्ष्मण, कोलायत में स्थित कपिल सरोवर में पानी पीने गया था, लेकिन वो पानी पीने की कोशिश में डूब कर मर गया। जब करणी माता को यह पता चला तो उन्होंने यम को उसे पुनः जीवित करने की प्रार्थना की। पहले तो यम ने साफ़-साफ़ मना किया पर बाद में उन्होंने विवश होकर उसे चूहे के रूप में पुनर्जीवित कर दिया। तबसे माँ करणी के आस-पास चूहों का मेला लगा रहता है।

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मंदिर से जुड़ी अन्य बातें Karni mata ke mandir ki kahani

  • ऐसा माना जाता है कि यदि आप हज़ारों काले चूहों में से एक सफेद चूहा देखते हैं, तो आप भाग्यशाली माने जाते हैं।
  • महापुरूषों का कहना है कि ये सफेद चूहे माता करणी की अभिव्यक्ति हैं जो देवी दुर्गा और उनके चार पुत्रों में से एक थी। 
  • इस मंदिर की यह खासियत है कि यहाँ चूहों को खिलाया गया प्रसाद भोग में बांटा जाता है। 
  • चूहों को बाकी जानवरों से बचाने के लिए मंदिर के ऊपर जाली वाली तिरपाल लगायी गयी है। 
  • मंदिर तक पहुंचना मुश्किल नहीं है क्योंकि शहर परिवहन के माध्यम से बहुत अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। बस, ट्रेन और टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं और मंदिर की ओर जाने वाली सड़क काफी आरामदायक है।

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