Kundeshwar mahadev mandir ka itihas: जानिए देवों के देव महादेव के कुंडेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास

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Kundeshwar mahadev mandir ka itihas – Kundeshwar mahadev temple history in hindi – भगवान शिव जिन्हें त्रिनेत्र देव, भोले शंकर, त्रिपुरारी, शंभू आदि नामों से पुकारा जाता है। विश्व पर मौजूद हर प्राणी के पालनकर्ता हैं। उनके बिना एक पत्ते का हिलना भी असंभव है। भगवान शिव की आराधना के लिए भारत के हर एक कोने पर शिव मंदिर स्थापित हैं। भारत में मौजूद कुछ प्रमुख तथा प्राचीन शिव मंदिर सर्वजगत में विख्यात हैं। शिव शंकर धरती के कई स्थानों पर प्रकट हुए जहां उनके मंदिर बनाए गए। इसी क्रम में बुदेलखंड के टीकमगढ़ में स्थापित कुंडेश्वर महादेव के मंदिर की भी महिमा अपरम्पार है। तो चलिए आपको बताते हैं कुंडेश्वर महादेव के मंदिर का इतिहास। kundeshwar mahadev mandir ka itihas

Kundeshwar mahadev mandir ka itihasKundeshwar mahadev Shiv temple history in hindi – Kundeshwar mahadev Shiv Temple mystery

बुदेलखंड के टीकमगढ़ में स्थापित कुंडेश्वर महादेव के मंदिर की भी महिमा अपरम्पार है। यहां के लोगों द्वारा माना जाता है कि यह कुंडेश्वर महादेव का शिवलिंग कई सैकड़ों साल पहले धरती में से प्रकट हुआ था जिसके बाद से इस शिवलिंग की आस्था तथा विश्वास के साथ पूजा अर्चना की जाती है। यह मन्दिर मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के कुंडेश्वर गांव में स्थित है। शिवलिंग की सेवा करने वाले भक्तों द्वारा यह भी बताया जाता है कि कुंडेश्वर महादेव का शिवलिंग हर साल चावल के आकार जितना बढ़ता है। इसके दर्शन से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं। मन को शांति मिलती है। सावन के महीने में यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा होती है। कुंडेश्वर महादेव के दर्शन के लिए आस पास के अलावा अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु पधारते हैं।

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Kundeshwar mahadev mandir ka itihas – Interesting facts about Kundeshwar mahadev temple in hindi

कुंडकेश्वर महादेव की कथा का सार – Kundeshwar mahadev temple history in hindi

एक बार माता पार्वती जी शिवजी से पूछती हैं कि उनका पुत्र वीरक कहां है? इसका उत्तर देते हुए शिवजी ने कहा कि तुम्हारा पुत्र महाकाल वन में तपस्या कर रहा है। तब पार्वती जी ने शिव से कहा कि वह उसे देखना चाहती हैं, अतः मुझे भी अपने साथ लेकर चलें। महादेव जी ने उनकी बात को स्वीकार किया और दोनों नंदी पर सवार होकर महाकाल वन के लिए निकल पड़े। रास्ते में एक पर्वत पर नंदी जी पार्वती जी के भयभीत होने के कारण रूक गए। शिवजी पार्वती से बोलते हैं कि तुम कुछ समय के लिए यहां रूको मैं पर्वत देखकर आता हूं। कुण्ड नामक गण तुम्हारी सेवा में रहेगा और तुम्हारी आज्ञा मानेगा।

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Kundeshwar Mahadev Temple – कुंडकेश्वर महादेव की कथा

शिवजी को पर्वत घूमते हुए 10 वर्ष बीत गए। शिव के न लौटने पर पार्वती दुख विलाप करने लगी और उन्होंने कुण्ड गण को आज्ञा दी कि वह उन्हें शिव के दर्शन कराएं। जब कुण्ड दर्शन नहीं करा सका तो पार्वती ने उसे मनुष्य लोक में जाने का श्राप दिया। इसी बीच शिव वहां आ गए। पार्वती ने कुण्ड से कहा कि तुम महाकाल वन में जाओ और वहां भैरव का रूप लेकर खड़े रहो। वहां उत्तर दिशा में सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला शिवलिंग है। तुम जाकर उसका पूजन करो तथा आज से शिवलिंग का नाम तुम्हारे नाम पर कुण्डेश्वर विख्यात होगा। कुण्ड ने पार्वती की आज्ञा से महाकाल वन में शिवलिंग के दर्शन कर पूजन किया और अक्षय पद को प्राप्त किया। मान्यता है कि शिवलिंग के दर्शन मात्र से सभी तीर्थो की यात्रा का फल प्राप्त होता है।

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