Maharaja Ranjit Singh Biography in Hindi – जानिए महाराजा रणजीत सिंह को क्यों दी गई ‘शेर-ए पंजाब’ की उपाधि

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Maharaja Ranjit Singh Biography in Hindi – महाराजा रणजीत सिंह भारत के प्रतापी एवं महान शासकों में से एक थे। वे शेर-ए पंजाब के नाम से प्रसिद्ध हैं। लाहौर (उनकी राजधानी) को अफगान आक्रमणकारियों से मुक्त करने में उनकी सफलता के लिये उन्हें ‘पंजाब का शेर’ (शेर-ए-पंजाब) की उपाधि दी गई थी। ये एक मज़बूत एवं विशाल सिख साम्राज्य के संस्थापक थे। महाराजा अपने न्यायपूर्ण और धर्मनिरपेक्ष शासन के लिये जाने जाते थे। उनके दरबार में हिंदू और मुस्लिम दोनों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया था। पंजाब के लोक जीवन और लोक कथाओं में महाराजा रणजीत सिंह से जुड़ी कई कहानियां सुनी जाती हैं। इनमें से अधिकांश कहानियाँ उनकी उदारता, न्यायप्रियता और सभी धर्मों के प्रति सम्मान के बारे में लोकप्रिय हैं। उन्हें अपने जीवन में लोगों का भरपूर प्यार मिला, अपने जीवनकाल में वे कई लोक कथाओं और जनश्रुतियों के केंद्र बने। तो चलिए आपको बताते हैं महाराजा रणजीत सिंह बायोग्राफी।Maharaja Ranjit Singh Biography in Hindi

Maharaja Ranjit Singh Biography in Hindi

महाराजा रणजीत सिंह का प्रारंभिक जीवन – Maharaja Ranjit Singh Early Life in Hindi

  • रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर 1780 को पंजाब क्षेत्र (वर्तमान पंजाब, पाकिस्तान) के गुजरांवाला में महा सिंह और राज कौर के घर हुआ। उनकी मां राज कौर जींद के सिख राजा गजपत सिंह की बेटी थीं।
  • उनके जन्म के बाद, उनके पूर्वज के नाम पर उनका नाम बुद्ध सिंह रखा गया था। बचपन में रणजीत सिंह छोटी चेचक बीमारी से पीड़ित हो गए थे, जिसके परिणामस्वरूप वह एक आंख से देख नहीं पाते थे।
  • 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पंजाब प्रशासनिक रूप से टुकड़ों में बंटा हुआ था इन्हें मिस्ल कहा जाता था और इन मिस्लों पर सिख सरदारों का शासन था।
  • रणजीत सिंह के पिता महा सिंह सुकरचकिया मिस्ल के कमांडर थे, जिसका मुख्यालय गुजरांवाला में था।
  • महाराजा रणजीत सिंह के पिता सुकरचकीय मिस्ल से सम्बन्ध रखते थे और यह क्षेत्र पंजाब के पश्चिमी हिस्से में था।
  • जब वे 12 साल के थे तब उनके पिता महा सिंह की मृत्यु हो जाने के बाद महाराजा रणजीत सिंह की परवरिश का पूरा भार उनकी माता के ऊपर आ गया।
  • उन्हें अपने पिता की सुकरचकिया मिस्ल विरासत में मिली। रणजीत सिंह ने कभी स्कूली शिक्षा नहीं ली और गुरुमुखी वर्णमाला के अलावा कुछ भी पढ़ना या लिखना नहीं सीखा। हालांकि, उन्हें घुड़सवारी, बंदूक चलाना और अन्य अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा घर पर दी गई थी।
  • उनका विवाह वर्ष 1796 में कन्हैया मिस्ल के सरदार गुरबख्श सिंह संधू और सदा कौर की बेटी मेहताब कौर से हुआ था।

रणजीत नाम कैसे पड़ा?

  • शुरू में इनका नाम बुद्ध सिंह था। कहा जाता है कि उनके पिता महा सिंह ने एक युद्ध में छतर सरदार पीर मुहम्मद को हराया था। अपनी इस जीत के उपलक्ष्य में बच्चे का नाम बदलकर रणजीत (शाब्दिक अर्थ – “युद्ध में विजेता”) सिंह (“शेर”) कर दिया गया था।

महाराजा रणजीत सिंह का मिस्लों के विरुद्ध सैन्य अभियान 

  • छोटे-छोटे मिस्लों में बंटे पंजाब को एक करने के लिए रणजीत सिंह ने सैन्य अभियान शुरू किया और मात्र 18 वर्ष की उम्र में 07 जुलाई 1799 में पहली बार इस अभियान में जीत हासिल की।
  • भंगी मिस्ल के चेत सिंह की सेना को हराकर इन्होंने लाहौर पर कब्‍ज़ा कर लिया। इसके बाद साल 1802 में उन्होंने अमृतसर को अपने साम्राज्य में मिला लिया।
  • अगले कुछ दशकों में धीरे-धीरे सभी मिस्लों को हरा कर एक विशाल राज्य की स्थापना की और पंजाब को एक संयुक्त राज्य बना दिया।
  • अपने सैन्य अभियान के माध्यम से संपूर्ण पंजाब राज्य को एकजुट कर लिया और राज्य में शांति व्यवस्था कायम करने के लिए एक प्रबल सिख साम्राज्य की स्थापना की।

रणजीत सिंह को महाराजा की पदवी कब मिली 

  • पंजाब के अन्य सभी मिस्ल सिखों को इन्होंने हरा दिया और पंजाब को एक संयुक्त राज्य के रूप में स्थापित किया। साल 1801 में उन्होंने सभी सिख गुटों को एक राज्य में एकजुट किया और 12 अप्रैल 1801 को “महाराजा” की उपाधि ग्रहण की।
  • यहीं से राजा रणजीत सिंह के सिर पर महाराजा का ताज सजा दिया गया। महज़ 20 साल की उम्र में उन्होंने यह उपलब्धि हासिल की थी।
  • जिस दिन महाराजा रणजीत सिंह को ताज पहनाया गया, वह दिन वैशाखी का दिन था। साहिब सिंह बेदी ने महाराजा रणजीत सिंह के मस्तिष्क पर केशरिया तिलक लगाया और उन्हें पंजाब का महाराजा घोषित किया था।

महाराजा रणजीत सिंह का सैन्य अभियान 

  • महाराजा बनते ही लाहौर को अपनी राजधानी बनाया और साम्राज्य का विस्तार शुरू कर दिया। वर्ष 1807 में अफगानी शासक कुतुबुद्दीन ऐबक को हरा दिया और कसूर क्षेत्र पर अपना एकाधिकार स्थापित किया।
  • साल 1818 में मुल्तान को अपने राज्य में मिला लिया। साल 1819 में कश्मीर क्षेत्र को अपने राज्य का हिस्सा बनाया।
  • महाराजा रणजीत ने अफगानों के खिलाफ कई लडाईयां लड़ीं और उन्हें पश्चिमी पंजाब की ओर खदेड़ दिया। अब पेशावर समेत पश्तून क्षेत्र पर उन्हीं का अधिकार हो गया। यह पहला मौका था जब पश्तूनों पर किसी गैर-मुस्लिम ने राज स्थापित किया।
  • 1813 ईस्वी से लेकर 1837 ईस्वी के मध्य तक इन्होंने कई युद्ध लड़े और जितने भी युद्ध लड़े उन सभी युद्धों में विजय हासिल की।
  • वर्ष 1837 ई. में उन्होंने जमरूद के विरुद्ध युद्ध किया और यह युद्ध महाराजा रणजीत सिंह का अंतिम युद्ध बन गया। इस युद्ध में कुछ सामरिक कारणों से अफगानों को बढ़त मिली और उन्होंने काबुल पर वापस कब्ज़ा कर लिया।
  • इनके साम्राज्य की सीमाएँ लद्दाख तक थीं जो उत्तर-पूर्व में खैबर दर्रा और दक्षिण में पंजनाद (जहाँ पंजाब की पाँच नदियाँ सिंधु में मिलती हैं) तक थीं।

सिख खालसा सेना का गठन 

  • महाराजा ने पहली आधुनिक भारतीय सेना “सिख खालसा सेना” गठित की और फ्रेंच-ब्रिटिश सिद्धान्तों पर इस सेना का आधुनिकीकरण किया।
  • इसे तीन भागों में विभाजित किया गया था – ‘फौज-ए-खास’ (कुलीन), ‘फौज-ए-आईन’ (नियमित बल) और ‘फौज-ए-बी कवायद’ (अनियमित)।
  • अपनी सेना के प्रशिक्षण और संगठन में बदलाव और सुधार किया। पैदल सेना और तोपखाने को प्रशिक्षित करने के लिए इन्होंने कई यूरोपीय अधिकारियों का उपयोग करके अपनी सेना का आधुनिकीकरण करना शुरू किया।
  • महाराजा और उनके यूरोपीय अधिकारियों के आजीवन प्रयासों के कारण, यह धीरे-धीरे एशिया की एक प्रमुख युद्ध शक्ति बन गए।
  • उनकी सरपरस्ती में पंजाब अब बहुत शक्तिशाली राज्य बन गया था। इसी ताकतवर सेना ने लंबे अर्से तक ब्रिटेन को पंजाब हड़पने से रोके रखा, उन्होंने न तो अंग्रेजो से युद्ध किया और न उनकी सेनाओं को अपने राज्य के अंदर आने दिया।
  • साल 1849 में अंग्रेजो के अधिकार में आने तक यहा सिखों का आधिपत्य बना रहा। महाराजा रणजीत खुद अनपढ़ थे, लेकिन उन्होंने अपने राज्य में शिक्षा और कला को बहुत प्रोत्साहन दिया।

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Maharaja Ranjit Singh Biography in Hindi

सिख साम्राज्य का पतन इन हिंदी 

  • 27 जून, 1839 को महाराजा रणजीत सिंह का निधन लाहौर में हो गया। इस समय वह केवल 59 वर्ष के थे। उनके कई बच्चे थे जिनमें बेटे खड़क सिंह, ईशर सिंह, शेर सिंह, पशौरा सिंह और दलीप सिंह शामिल हैं, हालाँकि उन्होंने केवल खड़क सिंह और दलीप सिंह को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया।
  • उनके बाद सिख साम्राज्य की कमान खड़क सिंह के हाथ में आई लेकिन ये मज़बूत सिख साम्राज्य को संभालने में नाकाम रहे। इसका नतीजा ये हुआ कि सिख साम्राज्य का पतन शुरू हो गया।
  • सिख और अंग्रेजों के बीच हुए 1845 के युद्ध के बाद महान सिख साम्राज्य पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया।

महाराजा रणजीत सिंह के विषय में महत्वपूर्ण बातें – Important things about Maharaja Ranjit Singh in Hindi

  • महाराजा रणजीत सिंह ने बहुत ही ऐतिहासिक गुरुद्वारा तख्त सिंह और तख्त सिंह हजूर का निर्माण कराया।
  • तख्त सिंह गुरुद्वारा का निर्माण दसवें सिख गुरु के जन्म के उपलक्ष में पटना में तथा तख्त श्री हजूर साहिब का निर्माण उनकी मृत्यु के स्थान पर करवाया।
  • अफगान शासक शाह शुजा की पत्नी ने महाराजा से अनुरोध किया कि अगर वे उनके पति को कश्मीर से सुरक्षित लाहौर ले आएंगे तो वह उनको कोह-ए-नूर हीरा देंगी। महाराजा ने शाह शुजा को बचाया जिसके बाद 1 जून, 1813 को उनको कोह-ए-नूर हीरा दिया गया, यह उनके खजाने की शान था।
  • अंग्रेजों ने सिखों से कोहिनूर हीरा ले लिया। लार्ड हार्डिंग ने इंग्लैण्ड की रानी विक्टोरिया को खुश करने के लिए कोहिनूर हीरा लंदन पहुंचा दिया, जो “ईस्ट इंडिया कम्पनी” द्वारा रानी विक्टोरिया को सौंप दिया गया।
  • हिन्दू मंदिरों को सोना भेंट करने के लिए वे प्रसिद्ध थे। काशी के विश्वनाथ मंदिर में भी उन्होंने अकूत सोना अर्पित किया था। काशी विश्वनाथ मंदिर पर जो स्वर्णपत्र आज दिखाई देता है, वह उनकी काशीयात्रा तथा उदारता का परिचायक है।

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