वाकाटक की रानी प्रभावतीगुप्त, जो बनी भारत की पहली महिला शासक

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Queen Prabhavatigupta storyरानी प्रभावतीगुप्त वाकाटक वंश की थी और उन्होंने साल 385 से 405  ई॰ तक शासन चलाया| इतिहास के अनुसार वह पहली महिला शासक थी, जिसने चौथी शताब्दी के दौरान कोई साम्राज्य संभालाप्रभावती गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय की बेटी थी| तो चलिए जानते हैं प्रभावतीगुप्त और उनके शासन वाकाटक के बारे में|queen prabhavatigupta story

कौन थी प्रभावतीगुप्त?- Queen Prabhavatigupta story

  • प्रभावतीगुप्त गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय की बेटी थी| उनकी शादी वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय के साथ 380 ई॰ के आसपास हुई थी, जिसके बाद दोनों घरानों में गहरी मित्रता हुई
  • राजा रुद्रसेन द्वितीय शैव धर्म मानने वाले थे जबकि प्रभावती वैष्णव धर्म को मानने वाली थी  लेकिन शादी के बाद रुद्रसेन भी वैष्णव बन गए थेप्रभावतीगुप्त के दो पुत्र हुए दिवाकर सेन और दामोदर सेन|
  • 390 ई॰ में रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु हो जाने के बाद अपने पिता के सहयोग से 20 वर्षों तक प्रभावतीगुप्त ने शासन किया|  उस दौरान किसी महिला का शासक होना एक अकल्पनीय बात लगती थी| मगर पति की मृत्यु के बाद अपने बेटों के सत्ता संभालने तक उन्होंने अपने राज्य की सुरक्षा की|
  • 410 ई॰ में प्रवरसेन द्वितीय वाकाटक का करता धर्ता बना (रुद्रसेन और प्रभावतीगुप्त का छोटा बेटा) और राजधानी नन्दिवर्धन को परिवर्तित करके प्रवरपुर बना दिया, जिसके बाद गुप्त सत्ता गुजरात एवं काठियावाड़ में स्थापित की गयी|

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वाकाटक राजवंश के बारे में – Vakataka Dynasty –  History of Vakataka Dynasty – Queen Prabhavatigupta story

 

  • वाकाटक वंश की स्थापना 255 ई. में विन्ध्य शक्ति ने की थी| इस वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक राजा प्रवरसेन प्रथम रहा था जिसने अपने शासनकाल में चार अश्वमेघ यज्ञों का आयोजन किया| वाकाटक ब्राह्मण धर्म के पक्षधर माने जाते थेवह खुद भी ब्राह्मण थे
  • सांस्कृतिक दृष्टि से वाकाटक राज्य ने ब्राह्मण घर्म के आदर्शों और सामाजिक संस्थाओं को दक्षिण की ओर बढ़ाने में एक महत्त्वपूर्ण काम किया हैदक्षिणापथ में शासन करने वाले समस्त राजवंशों में वाकाटक वंश सबसे सर्वश्रेष्ठ माना जाता था, जिसने तीसरी सदी के मध्य से छठी सदी तक शासन किया
  • इस राजवंश ने मध्य भारत तथा दक्षिण भारत के ऊपरी भाग में शासन किया और अपने उसूलों के कारण लोकप्रिय हुए| वाकाटक वंश के लोग विष्णु वृद्धि गोत्र के ब्राह्मण थे| प्रथम प्रवरसेन ने दक्षिण में राज्य विस्तार के उपलक्ष में चार अश्वमेध किए और सम्राट की पदवी धारण की
  • वाकाटक वंश के तीसरे शासक महाराज रुद्रसेन की वजह से वाकाटक को प्रसिद्धि मिली, लेकिन लापरवाही के कारण वह अपने राज्य को संभाल न पाए
  • ख़राब परिस्थितियों की वजह से सम्राट समुद्रगुप्त ने कौशांबी के युद्ध में वाकाटक नरेश रुद्रसेन प्रथम को मार दिया| वाकाटक अभिलेखों के आधार पर मालूम चलता है कि इस राजवंश की कई पीड़ियां गुप्त रही थी  जिससे कई सालों तक इस वंश की कोष सेना तथा प्रतिष्ठा चली आ रही थी

 

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रुद्रसेन द्वितीय के बारे में  – Queen Prabhavatigupta story

  • पृथ्वीसेन प्रथम के बाद उसका पुत्र रुद्रसेन द्वितीय (385-390 ईस्वी) गद्दी पर बैठा और साम्राज्य संभाला| इस समय वाकाटकों पर गुप्तों का प्रभाव बढ़ने लगा था और उनमें मित्रता होने लगी थी|  
  • रुद्रसेन द्वितीय ने इस प्रभाव में आकर अपने कुलागत शैव धर्म को छोड़कर वैष्णव धर्म अपना लिया जो चन्द्रगुप्त का धर्म था| दुर्भाग्यवश लगभग 30 वर्ष की अल्पायु में ही रुद्रसेन की मृत्यु हो गयी जिसके बाद उनकी पत्नी प्रभावतीगुप्ता वाकाटक राज्य की संरक्षिका बनी|

प्रभावतीगुप्ता का संरक्षण-काल  – Queen Prabhavatigupta story

  • पति की मृत्यु के बाद प्रभावतीगुप्ता ने वाकाटक राज्य का संचालन बड़ी कुशलता और ईमानदारी से किया| वह किसी भी कार्य में अपने पिता की मद्द लेती थी
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री को प्रशासनिक कार्यों में सहायता देने के लिये अपने राज्य के योग्य तथा अनुभवी मंत्रियों को उसकी सहायता के लिए भेजा था
  • उस समय बासीम शाखा में विन्ध्यशक्ति द्वितीय का शासन थाबासीम शाखा की स्थापना 330 ईस्वी में हुई थी| उसने वत्सगुल्म नामक स्थान में अपने लिये एक स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया थावत्सगुल्म महाराष्ट्र के अकोला जिले में आधुनिक बासीम में स्थित थाइस साम्राज्य के कुछ शासकों के नाम अजंता की सोलहवीं गुफा से प्राप्त एक लेख में मिलते हैं|
  • उसने प्रभावतीगुप्ता का कोई विरोध न करते हुए मित्रता का फैसला लिया| प्रभावतीगुप्ता के संरक्षण काल में ही उसके बड़े बेटे दिवाकरसेन की मृत्यु हो गयी थी| तब 410 ईस्वी में उसका छोटा पुत्र दामोदरसेन प्रवरसेन द्वितीय के नाम से गद्दी पर बैठा
  • प्रभावतीगुप्ता प्रवरसेन द्वितीय के शासनकाल में लगभग 25 वर्षों तक जीवित रही तथा उसकी मृत्यु 75 वर्ष में हुई| इतिहासकारों के अनुसार शासिका के रूप में उनके शासन में मुहरें जारी की गई और अन्य ऐसे काम किये गए जिससे महिला शासक के रूप में उनका ओहदा बढ़ गया और उस समय किसी और महिला शासक होने के कोई तथ्य नहीं मिले|

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