पति की लंबी उम्र और पाप कर्मों की क्षमायाचना के लिए करना न भूलें जैन धर्म में प्रचलित रोहिणी व्रत

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Rohini Vrat Puja Vidhi in Hindi –  जैन समुदाय में रोहिणी व्रत का बहुत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। 28 दिसंबर 2020 को यह व्रत मनाया जा रहा है। 27 नक्षत्रों में शामिल रोहिणी नक्षत्र के दिन इस व्रत को मनाया जाता है, इसी वजह से इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी व्रत का जैन समुदाय में खास महत्‍व है। यह व्रत महिलाओं द्वारा अपने पतियों के लंबे जीवन के लिए मनाया जाता है। यह व्रत खास कर उस दिन मनाया जाता है जब सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र प्रबल होता है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग रोहिणी व्रत का पालन करते हैं, वे सभी प्रकार के दुखों और गरीबी से छुटकारा पा सकते हैं। साल में बारह रोहिणी व्रत होते हैं। आमतौर पर रोहिणी व्रत तीन, पांच या सात वर्षों तक लगातार मनाया जाता है तभी इसका पूर्ण रूप से फल मिलता है। रोहिणी व्रत को उद्यापन के साथ समाप्त करना चाहिए।

rohini vrat puja vidhi

रोहिणी व्रत का महत्व । rohini vrat mehtava – significance – Rohini Vrat Puja Vidhi

  • इस दिन जैन समाज के लोग भगवान वासुपूज्य की पूजा करते हैं।
  • इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं और उनके स्वास्थ्य के लिए मंगल कामना करती हैं।
  • इसके अलावा इस दिन सभी लोग अपनी गलतियों की क्षमायाचना करते हैं।

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रोहिणी व्रत से जुड़ी कहानी । rohini vrat story – Rohini Vrat Puja Vidhi – rohini vrat katha

  • राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्‍मीपति के साथ चंपापुरी में रहते थे। उनकी एक बेटी जिसका नाम रोहिणी था और सात बेटे थे। एक बार राजा ने ज्योतिषी से पूछा कि मेरी बेटी की शादी किससे होगी? तो उन्‍होंने कहा हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ उसका विवाह होगा। तब राजा ने स्‍वयंवर का आयोजन किया है, जिसमें रोहिणी ने राजकुमार अशोक को अपना वर चुना। एक बार हस्तिनापुर में श्री चारण मुनि आए। राजा अपने परिवार के साथ उनके दर्शन के लिए गए। राजा ने पूछा कि मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्‍यों है? तब मुनि ने कहा, इसी नगर में वस्‍तुपाल नाम का राजा था और उसका धनमित्र नाम का एक मित्र था।
  • धनमित्र की एक दुर्गंधा कन्‍या थी जिसके बारे में उसके पिता को हमेशा चिंता रहती थी। इस कन्‍या से कौन विवाह करेगा। धनमित्र ने दहेज का लालच देकर उसका विवाह अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से कर दिया। फिर भी यह विवाह सफल नही हुआ और कन्या की दुर्गंध से पीड़ित होकर उसका पति एक महीने बाद ही उसे छोड़कर कहीं चला गया। इसी समय अमृतसेन नाम के ऋषि नगर में आए, तो धनमित्र अपनी बेटे के साथ उन्हें प्रणाम करने गया और बेटी के दुख का कारण और उसको दूर करने का उपाय पूछा। तब ऋषि ने कहा कि उसकी बेटी पिछले जन्म में गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल की सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा ने वन जाते हुए रास्ते में एक मुनि को देखा तो रानी से उनके भोजन की व्यवस्था करने को कह आगे चला गया। अपने आनंद में विघ्न पड़ने से रानी गुस्से में आ गई और ऋषि के भोजन में कडुवी तुम्‍बीका परोसा जिससे मुनि को अत्‍यंत वेदना हुई और उन्‍होंने प्राण भी त्‍याग दिये।
  • राजा को जब ये पता चला तो उसने तो रानी का त्याग किया जिससे ऋषि हत्या के पाप के कारण उसके शरीर में कोढ़ हो गया। कष्ट और पीड़ा को भोगते हुए मरने के बाद वो रौरव नर्क को प्राप्त हुई और फिर दुर्गंध युक्त कन्या के रूप में धनमित्र के घर पैदा हुई। तब धनमित्र ने पूछा कि किस व्रत और धर्म कार्य करने से इस पाप से मुक्ति मिल सकती है। तब ऋषि ने बताया रोहिणी व्रत का पालन करो, अर्थात् हर महीने में रोहिणी नक्षत्र पर चारों प्रकार के आहार त्‍याग कर पूजा, अभिषेक कर अपनी क्षमता अनुसार दान करें। इस प्रकार यह व्रत 5 वर्ष और 5 महीने तक करें, तो मुक्ति हो सकती है। इस पर दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक व्रत धारण किया और अंत में मृत्यु के बाद स्‍वर्ग में गयी। इसके बाद जन्म लेने पर राजा अशोक की रानी बनी। तब अशोक ने अपने बारे में पूछा, तो मुनि ने कहा कि पूर्व जन्म में भील होते हुए उसने एक मुनि पर घोर उपसर्ग किया था इसलिए मरकर नरक गया और फिर अनेक कुयोनियों में भ्रमण करता हुआ एक वणिक के घर अत्‍यंत घृणित शरीर वाले पुत्र के रूप में जन्म लिया। इसके बाद एक साधु के उपदेश पर उसने रोहिण व्रत किया जिसके फलस्‍वरूप स्वर्ग प्राप्त करके राजा बन कर हस्तिनापुर में जन्म लिया। तब से मान्यता बनी जैसे राजा अशोक और रानी रोहिणी ने रोहिणी व्रत के प्रभाव से स्‍वर्गादि सुख भोगकर मोक्ष प्राप्‍त किया, उसी तरह जो भी यह व्रत करेगा वे सभी सुख को प्राप्त करेंगे।

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रोहिणी व्रत पूजा विधि । Rohini Vrat Puja Vidhi in Hindi

  • प्रातः काल उठ कर स्नान करें।
  • भगवान वासुपूज्य की मूर्ती स्थापित करें।
  • उसके बाद फल, फूल, वस्त्र चढ़ाएं और नैवेद्य का भोग लगाएं।
  • पूजा के बाद अपनी श्रद्धानुसार गरीबों को दान करें।

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