राम नाम में बीता संत कबीर का जीवन, जानिए उनसे जुड़ी ये खास बातें

sant kabir biography – कबीर एक बहुत बड़े अध्यात्मिक व्यक्ति थे। प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण उन्हें पूरी दुनिया की प्रसिद्धि प्राप्त हुई। उनकी याद में हर साल ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को कबीर जंयती मनाई जाती है। इस साल 17 जून को करीब जयंती मनाई जाएगी। उन्होंने अपनी कविताओं और दोहों से सामाजिक अंधविश्वास की निंदा और बुराइयों की सख़्त आलोचना की। आज भी पूरा देश उनको याद करता है। तो चलिए आपको उनके जीवन से जुड़ी कुछ और बाते बताते हैं।

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कब हुआ संत कबीर का जन्म

कबीर को कबीरा के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि इनका जन्म लहरतारा ताल (काशी) में 14वी-15वी शताब्दी के बीच में हुआ था।

  • उनके मातापिता के बारे में कहा जाता है कि वे “नीमाऔर “नीरुकी संतान थे। किवदंती के अनुसार कबीर को एक विधवा ब्राह्मणी का पुत्र बताया जाता है।
  • उनके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि उनका लालन-पालन जुलाहा परिवार में हुआ था। जुलाहे मुसलमान हैं, जिसके बारे में सन् 1901 की मनुष्य-गणना के आधार पर रिजली साहब ने पीपुल्स ऑफ़ इंडियानामक एक ग्रंथ लिखा था।
  • कबीर ने खुद कोई ग्रंथ नहीं लिखा, उन्होंने सिर्फ मुँह से ही बोले और उनकी वाणियों को शिष्यों ने लिखा।
  • शिष्यों ने उनकी वाणियों का संग्रह “बीजक” नाम के ग्रंथ में किया है, जिसके तीन प्रमुख भाग साखी , सबद (पद ) और रमैनी हैं।
  • ऐसा कहा जाता है कि कबीर की शादी वनखेड़ी बैरागी की पालिता कन्या लोईसे हुई थी। उनकी दो संतान थी कमाल और कमाली।
  • करीब ने अपना पूरा जीवन राम की भक्ति में समर्पित कर दिया। जिस वजह से उनके दोहे आज भी उतने की लोकप्रिय हैं जितने उस समय में थे।
  • कबीर की दृढ़ मान्यता थी कि कर्मों के अनुसार ही गति मिलती है स्थान विशेष के कारण नहीं। अपनी इस मान्यता को सिद्ध करने के लिए अंतिम समय पर वह मगहर चले गए, क्योंकि लोगों की मान्यता थी कि काशी में मरने पर स्वर्ग और मगहर में मरने पर नरक मिलता है।
  • मगहर में उन्होंने अंतिम साँस ली। आज भी वहां स्थित मजार व समाधी स्थित है।
  • करीब जितने हिन्दुओं में लोकप्रिय थे, उतने ही मुस्लिम लोगों में भी। ​जिस वजह से उनकी मृत्यु के समय में यह संशय बना रहा कि उनका अंतिम संस्कार किस रीति- रिवाज़ से किया जाएगा।

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कबीर के प्रसिद्ध दोहे –  sant kabir biography

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

  • अर्थ: जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।

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तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,

कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

  • अर्थ: कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है।

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