Shailputri Mata Vrat Katha: जानिए नवरात्रि के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की कथा

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Shailputri Mata Vrat Katha pdf – Navratri ke pehle din ki kathaNavaratri Day 1 maa shailputri vrat katha pdf – हिंदू धर्म में नवरात्रि का पर्व नौ देवियों की पूजा तथा आराधना के उद्देश्य से मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में नौ अलग – अलग देवी माताओं का पूजन, व्रत तथा कथा की जाती है। इन दिनों भक्त व्रत रखते हैं तथा व्रत की कथा पढ़ते हैं। नवरात्रि के व्रत के साथ व्रत कथा को करना भी विशेष माना जाता है। इन नौ दिनों की कथाओं के माध्यम से देवियों की महिमा का गुणगान किया जाता है इसलिए आपके नवरात्रि पर्व को मंगलमय बनाने के लिए आज हम आपके लिए नवरात्रि के प्रथम दिन की व्रत कथा लेकर प्रस्तुत हुए हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन माता शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। माता शैलपुत्री की कथा आपके नवरात्रि का प्रथम दिन सफल बनाएगी।shailputri mata vrat katha

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माता शैलपुत्री की कथा – Shailputri Mata Vrat Katha pdf – Maa Shailputri Navratri Vrat Katha PDF

एक बार भगवान शिव की पत्नी देवी सती के पिता प्रजापति दक्ष ने विशाल यज्ञ किया जिसमें उन्होंने समस्त देवी देवताओं को निमंत्रण दिया, किन्तु भगवान शिव को यज्ञ में आने का न्यौता नहीं दिया। जब यह बात माता सती को ज्ञात हुई कि उनके पिता ने यज्ञ का आयोजन किया है तो उनका मन यज्ञ में जाने के लिए उत्सुक होने लगा उन्होंने अपने मन की बात शिवजी को बताई। शिवजी ने सती से कहा, प्रजापति दक्ष ने अपने विशाल यज्ञ में सारे देवताओं को बुलाया परंतु हमें निमंत्रण नहीं दिया। इसका अर्थ है कि वे हमसे किसी बात से रूष्ट हैं। ऐसे में तुम्हारा वहां जाना उचित नहीं है, लेकिन शिवजी की बात सुनकर भी सती का मन शांत नहीं हुआ। उनका मन अपने मायके जाने के लिए व्याकुल रहा जिस कारण शिवजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति प्रदान कर दी।

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जब सती अपने पिता के घर पहुंची तो वहां कोई भी उनसे प्रेम से बात नहीं कर रहा था। किसी ने भी उनका आदर सम्मान भी नहीं किया। मात्र उनकी माता ने ही उन्हें स्नेह से बिठाया। इसके अतिरिक्त सभी के शब्द उपहास तथा व्यंग्य से परिपूर्ण थे। अपने परिजनों के इस व्यवहार से माता सती को गहरा आघात पहुंचा। वे मन ही मन सोचने लगी कि मुझे शंकर जी की बात को मान कर यहां नहीं आना चाहिए था। अपने पति शिव – शंकर के अपमान को वह सह न सकी और उसी क्षण योगाग्नि द्वारा स्वयं को भस्म कर लिया। इस बात की खबर जब शिवजी को मिली तो उन्होंने क्रोध में अपने गणों को भेजकर दक्ष का यज्ञ पूर्ण रूप से विध्वंस करवा दिया। माता सती ने अपना अगला जन्म शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में लिया जहां वह शैलपुत्री के नाम से विख्यात हुई। भगवान शिव की पत्नी, पार्वती भी यही बनी तथा हैमबती के रूप में देवताओं का गर्व भंजन भी किया।

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