Yajurveda hindi pdf – वेद का द्वितीय भाग यजुर्वेद के बारे में जानिए

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Yajurveda hindi pdf – Yajurveda in hindi – Yajurveda kya hai  – facts about Yajurveda – Yajurveda meaning in hindi – हिंदू धर्म के सर्वश्रेष्ठ तथा प्राचीन ग्रंथ वेद हैं जिसमें से यजुर्वेद वेद का द्वितीय भाग है। यजुर्वेद ऋग्वेद  के बाद आता है। अतः इसके अंदर ऋग्वेद से संबंधित अनेक सूक्तियां तथा ज्ञान सम्मिलित हैं। स्पष्ट रूप से कहें तो, ऋग्वेद के अन्तर्गत ६६३ मंत्रों को पाया जाता है। इसके बाबजूद ऋग्वेद व यजुर्वेद पृथक हैं क्योंकि यजुर्वेद मुख्य रूप से एक गद्यात्मक वेद हैं जिसमें सम्मिलित समस्त गद्यात्मक मंत्रों को यजुस कहा जाता है तथा इसमें पद्यात्मक मंत्रों की संख्या बेहद कम है। तो चलिए वेद का द्वितीय भाग यजुर्वेद के बारे में जानिएyajurveda hindi pdf

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यजुर्वेद का अर्थ : यजुर्वेद शब्द यजुस + वेद इन दो शब्दों की संधि से बना है जिसमें यजु शब्द का अर्थ समर्पण से होता है। पदार्थ, जैसे (ईंधन, घी, आदि), कर्म (सेवा, तर्पण ), श्राद्ध, योग, इंद्रिय निग्रह आदि के हवन को समर्पण की क्रिया कहा गया है। यह ग्रंथ कर्मकाण्ड प्रधान हैं। इस वेद के अन्तर्गत यज्ञों तथा हवन के मंत्र शामिल हैं। इसमें आर्यों के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन का सार प्राप्त होता है।

Yajurveda in hindi  

इस वेद में कर्मकाण्ड के कई यज्ञों का विवरण है जैसे –

अग्निहोत्र

अश्वमेध

वाजपेय

सोमयज्ञ

राजसूय

अग्निचयन

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यजुर्वेद का परिचय: Yajurveda kya hai – facts about Yajurveda

यजुर्वेद में मुख्यता दो सम्प्रदाय अथवा शाखाएं हैं: krishna and shukla yajurveda

१. दक्षिण भारत में प्रचलित, कृष्ण यजुर्वेद जिसे ब्रह्म सम्प्रदाय माना जाता है।

२. उत्तर भारत में प्रचलित शुक्ल यजुर्वेद जिसे आदित्य सम्प्रदाय कहा जाता है।

महर्षि पतंजलि द्वारा उल्लेखित यजुर्वेद की 101 शाखाओं में से वर्तमान में निम्न पांच शाखाएं ही उपलब्ध हैं – वाजसनेय, कठ, तैत्तिरीय, कपिष्ठल तथा मैत्रायणी। तैत्तरीय संहिता जो कृष्ण यजुर्वेद की शाखा से संबंधित है, उसे ‘आपस्तम्ब संहिता’ भी कहते हैं।

इस वेद के माध्यम से उत्तरवैदिक काल की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक जीवन के विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। यह एक ऐसा वेद है जो हवन तथा यज्ञ इत्यादि करने के मंत्रों से भरा हुआ है। आपको बता दें, यजुर्वेद के अंदर यज्ञ संपन्न कराने वाले तथा आहुति के दौरान प्रयुक्त होने वाले मंत्रों की एक पुस्तिका उपलब्ध है।

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ई. पू. की दूसरी सहस्त्राब्दी के अंत से लेकर पहली सहस्त्राब्दी के आरंभिक शताब्दियों के बीच लिखी जाने वाली संहिताएं संभवतः यजुर्वेद की आखिरी संहितायें हैं।

शुक्ल यजुर्वेद की शाखाओं में दो संहिताएं प्रमुख मानी गई हैं, जो वर्तमान में उपलब्ध हैं –

पहली, मध्यदिन संहिता दूसरी, काण्व संहिता ।

इसमें ४० अध्याय हैं, १९७५ कणिकाएं हैं। इनके अंदर ३९८८ मंत्र शामिल हैं। विश्व में गाया जाने वाला महामृत्युंजय मंत्र तथा गायत्री मंत्र का जाप यजुर्वेद में भी मिलता है।

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विष्णु पुराण के अनुसार, याज्ञवल्क्य द्वारा शुक्ल यजुर्वेद को सूर्य से प्राप्त किया था जिस कारण यह उल्लेखित है कि शुक्ल यजुर्वेद की समस्त शाखाएं याज्ञवल्क्य द्वारा ही प्रवर्तित की गई हैं।

यजुर्वेद को यदि धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो इसमें देवताओं के स्वरूपों को परिवर्तित करके बताया गया। हालांकि यह वेद ऋग्वेद से ही लिया गया है तथा अधिकतर इससे मिलता जुलता है। यजुर्वेद में प्रजापति तथा अप्सराओं का महत्व अधिक हो गया। पूर्ण रूप से यजुर्वेद कर्म, क्रिया व यज्ञ का प्रधान है।

इस प्रकार यजुर्वेद वेद के दूसरे भाग के रूप में मौजूद है जो आपको धार्मिक समर्पण के कार्यों को अंतिम पड़ाव पर पूरा करने की विद्या देता है।

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